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Rahul Dravid : वो दीवार जिसे कोई ना भेद पाया, महान राहुल द्रविड़

# महान_राहुल_द्रविड़  महान सिर्फ इसलिए नहीं कि उन्होंने इतने ढ़ेर सारे रन बनाएं, इतने ढ़ेर सारे कैच पकड़े, भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान भी रहे। बल्कि महान इसलिए कि ये जो इतने सारे रन बनाए ये उन मुश्किल हालातों में बनाएं जहाँ रन बनाना किसी पहाड़ तोड़ने से कम नहीं था, ये ढ़ेर सारे कैच ऐसे कैच थे जिन्हें पकड़ पाना आम फील्डर के बस की बात नहीं थी और कप्तान उन हालातों में रहे जब भारतीय टीम बुरे हालात में थी। जब भारतीय टीम के पुतले फूंके जा रहे थे, जब खिलाडियों के घरों पर हमले किये जा रहे थे। इन सब से अलग एक बेहद ही सौम्य और शांत खिलाड़ी जब आक्रामक होता था तब अपने बल्ले से निकली 'टक' की आवाज से विरोधियों के गालों पर थप्पड़ मारता था। जिससे उलझने से पहले गेंदबाज ये सोचता था कि इसका भुगतान हमें लंबी पारी के रूप में भुगतना पड़ सकता है। लोगों के चौकों-छक्कों की चर्चाओं के बीच एक ऐसा शख्स था जिसके डिफेंस की चर्चा होती थी, जिससे कट शॉट की चर्चा होती थी। मेरा क्रिकेट का लगाव कितना पुराना है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि मैं इस खिलाड़ी के सबसे महत्वपूर्ण और महान दौर का गवाह बना। जिस दि...

2018 विशेष... 2019 शेष

पुराने वर्ष में बहुत सी बातें हुई, बहुत अच्छे-अच्छे लोगों से मुलाकातें भी हुई। जिन्हें दूर से जानता-समझता था उनके करीब आकर उन्हें जानने-समझने का मौका मिला.. कुल मिलाकर वर्ष 2018 मेरे लिए खास इसलिए रहा क्योंकि इस वर्ष मैंने हर चीज़ का थोड़ा-थोड़ा स्वाद लिया, थोड़ी खुशियां, थोड़ा ग़म, थोड़ा साहस, थोड़ा डर।  बहुत सारे दोस्त मिले, इनमें से कुछ बहुत अच्छे दोस्त बने। दिल्ली आने की ख्वाहिश थी और दिल्ली के करीब आ भी गया। कभी-कभार दिल्ली आना-जाना भी लगा रहता है। दिल्ली के दिल में जगह बनाने की पुरजोर कोशिश चल रही है और भरोसा है ये कोशिश जल्द ही कामयाब होगी। इस वर्ष की हर बात खास रही, शुरुआत तो बड़ी नीरस हुई थी,एक निराश-हताश डरे हुए दिव्यमान के साथ जिसमें आत्मविश्वास नाम की कोई चीज़ ही नहीं थी। जो हालातों से डर रहा था। जो दुनिया से भाग रहा था, अपने परिवार-रिश्तेदार से भाग रहा था। बचपन के दोस्तों के साथ चाह कर भी अपने दिल की बात नहीं कह पा रहा था। लेकिन वक़्त ने करवट ली और उसे 3 साल के लंबे इंतजार के बाद दिल्ली के करीब आने का मौका मिला। जो लड़का आजतक कोई एंट्रेन्स एग्जाम ...

2.0 Movie Review : 2.0 वीएफएक्स है असली हीरो

कलाकार- रजनीकांत, अक्षय कुमार, एमी जैक्सन, आदिल हुसैन, इत्यादि लेखक और निर्देशक - शंकर अवधि - 2 घंटा 30 मिनट रेटिंग - 3.5/5 आज दर्शकों की अपेक्षाएं इतनी ज्यादा बढ़ गयी हैं कि उनकी पसंद के स्तर तक पहुँच पाना आज के फ़िल्म निर्माताओं की सबसे बड़ी चुनौती बन चुकी है। हॉलीवुड की हजारों करोड़ की फिल्मों से भारत की फिल्मों की तुलना थोड़ी बेमानी तो लगती है लेकिन दर्शक ना चाहते हुए भी वही उम्मीद लगा बैठते हैं। ठीक वही उम्मीद 2.0 फ़िल्म के साथ दर्शकों ने लगा रखी थी। फ़िल्म रिलीज़ भी  हो गयी और दर्शकों के बीच आ भी गयी। जहाँ दर्शक आजकल लगभग 3000 हजार करोड़ की बनी हॉलीवुड की 'एवेंजर इनफिनिटी वार' देख रहे हैं। वही दूसरी ओर लगभग 550 करोड़ में बनी भारतीय फ़िल्म 2.0 क्या उनकी उम्मीदों पर खरी उतर पाती है? आइये जानने की कोशिश करते हैं। कहानी- फ़िल्म की कहानी शुरू होती है एक ओनिर्थोलॉजिस्ट यानी पक्षियों के विशेषज्ञ वैज्ञानिक पक्षी राजन (अक्षय कुमार) की मोबाइल टॉवर पर चढ़ कर आत्महत्या करने से। जिसके बाद पूरे शहर से मोबाइल फोन अचानक से गायब होने लगते हैं। फिर प्रोफेसर वशीकरण (रजनीकांत) को इस आश...

संगिनी - लघुकथा

उस सर्द रात में मैं अपने गुस्से वाली गर्मी को ज्यादा देर तक बरकरार नहीं रख पाया, जितनी भी गर्मी थी मेरे दिमाग में सब इन ठिठुरन भरी सर्द हवाओं ने ठंडा कर दिया था। सोच रहा था आखिर ये गुस्सा मुझे इस वक़्त ही क्यों आया, बेबस निगाहों से मैं दरवाजे की तरफ देख रहा था और सोच रहा था, "अब वो आयेगी, अब वो आयेगी।" बहुत देर हो गयी इतने देर में तो उसका भी गुस्सा शांत हो जाना चाहिये था, लगता है ये ठंडी हवायें जिन्होंने मेरे गुस्से को ठंडा कर दिया, अंदर उसके पास तक नहीं पहुँच पा रही। "मेरा भी न अपने गुस्से पर काबू नहीं रहता,अब भुगतो! लगता है आज की रात बाहर ही बितानी पड़ेगी" मै खुद से बाते करते हुए बुदबुदा रहा था। अचानक दरवाजे के खुलने की आवाज आयी दरवाजे की तरफ देखा तो दरवाजे पर मेरी बिटिया थी, उसने मेरी खिंचाई करते हुए पूछा,"क्यों पापा मजे में हो?" मैंने बेबसी और लाचारी भरे स्वर में उससे पूछा,"अंदर का माहौल कैसा है?" "बहुत गर्मी है अंदर पापा" मेरी बेटी ने शैतानी वाले अंदाज़ में जवाब दिया, "आज रात तो यहीं काटनी पड़ेगी आपको।" मै अभी कुछ ...

फ़िल्म समीक्षा:- ओ स्त्री! तुम जितनी डरावनी हो, उतनी ही खूबसूरत भी हो..

कलाकार- राजकुमार राव, श्रद्धा कपूर, पंकज त्रिपाठी, अपारशक्ति खुराना, अभिषेक बनर्जी, विजय राज, अतुल श्रीवास्तव लेखक- राज और डीके निर्देशक- अमर कौशिक अवधि- 2 घंटा 10 मिनट रेटिंग- 4/5 जब बात आती है कि बॉलीवुड की पिछली हॉरर-कॉमेडी फ़िल्म कौन सी है तो नाम आता है गोलमाल-अगेन, लेकिन ताजा रिलीज स्त्री की तुलना गोलमाल-अगेन से करना थोड़ी बेमानी होगी क्यूंकि ये फ़िल्म एक हॉरर-कॉमेडी के साथ-साथ एक महत्वपूर्ण संदेश भी देती है। फिल्म की कहानी शुरू होती है मध्यप्रदेश के चंदेरी नामक स्थान से,जहाँ के हर घर पर लिखा होता है, "ओ स्त्री! कल आना" चूँकि उस गाँव में लोगों का कहना है कि पूजा के चार दिन के वक़्त में 'स्त्री' नामक चुड़ैल आती है और मर्दों को उठा कर ले जाती है, बस कपड़े छोड़ जाती है। उसी गाँव में एक नये ज़माने का नया दर्जी रहता है विक्की (राजकुमार राव)। उसके दो दोस्त हैं बिट्टू (अपारशक्ति खुराना) और जना (अभिषेक बनर्जी)।  विक्की की मुलाकात एक गुमनाम लड़की (श्रद्धा कपूर) से होती है जो हर साल पूजा के वक़्त ही आती है। उस लड़की से विक्की को प्यार हो जाता है लेकिन विक्की के दोस...

देश के भविष्य की धुंधली तस्वीर

हमारा देश 72वां स्वतंत्रता दिवस मनाने की तैयारी कर रहा है। जहां देश की बड़ी-छोटी सभी संस्थाओं में स्वतंत्रता की कहानियां सुनाई जायेंगी तथा स्वतंत्रता मायने समझाये जायेंगे, वहीं एक ओर आजादी के 71 वर्ष बाद मुजफ्फ रपुर -देवरिया जैसे कांड एक सभ्य देश की महानता में धब्बा लगा रहे हैं। पहले मुजफ्फरपुर और फिर देवरिया शेल्टर होम से आने खबरों ने लोगों को आश्चर्यचकित कर दिया है। जब देवरिया शेल्टर होम से एक 10 साल की लड़की भागकर थाने पहुंची और उस लड़की ने शेल्टर होम में चल रहे वेश्यावृत्ति का खुलासा किया, तब पुलिस प्रशासन ने देवरिया के उस बाल और महिला संरक्षण गृह पर छापा मार वहां मौजूद 24 लड़कियों को रिहा कराया। हालांकि उस शेल्टर होम की और 18 लड़कियां गायब थी, जिनकी तलाश अभी भी जारी है। मुजफ्फरपुर और देवरिया कांड से पूरा देश आक्रोशित है,और हो भी क्यों ना समाज कल्याण की आड़ में में समाज के कुछ ठेकेदारों द्वारा समाज को शर्मसार करने वाला कार्य किया जा रहा है। आए दिनों  देश में बाल यौन शोषण की घटनाएं सामने आ रही हैं। यह परिस्थिति बेहद ही देश के लिये चिंताजनक है। आखिर क्या वजह है जो एक सभ्य सम...

।।बंगाल से लावारिस लाश।।

नमस्कार! मै बंगाल से लावारिस लाश बोल रही हूँ.. मेरी कफ़न भी उसी रंग की है जिस रंग की यूपी, बिहार, दिल्ली,पंजाब,महाराष्ट्र इत्यादि राज्यों की लाशों की होती हैं। "जस्टिस फॉर बंगाली लाश" क्यों नहीं? मेरे लिए सच्ची छोड़ो वो झूठी राजनीतिक हमदर्दी क्यों नहीं? सुना है आप लोकतंत्र और संविधान के रक्षक हैं, क्या मेरी मौत संविधान के दायरे में नहीं आती क्या? क्या मेरी मौत संविधान ज़ायज ठहराता है? क्या मेरे घर में लगी आग की तपिश दिल्ली तक नहीं पहुँच पाती? अगर है तो मेरी चीख,मेरी तड़प क्यों नहीं सुनाई देती? क्यों मेरी मौत पर शोर नहीं होता? क्यों मेरी लटकी लाश के सच को झुठलाया जाता है? मुझे भी भीड़ ही मारती है फिर क्यों इस मौत की भर्त्सना कोई नहीं करते? क्यों फिर तुम्हे देश में असहिष्णुता नहीं दिखती? तुम मेरी क़ब्र पर अपना सुंदर आलीशान साम्राज्य स्थापित कर राजनीति-राजनीति क्यों खेलते हो? क्यों, आखिर क्यों? आपसे निवेदन है कि अगर इन सवालों का जवाब मिले तो मेरी मौत के साथ बिखर चुके मेरे परिवार को अवश्य दे देना।                         ...