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क्या सच में न्याय हो गया?

क्या सच में न्याय हो गया? बलात्कार होने से ना रोका जा सका। बलात्कार के बाद कानूनी लड़ाई में भी सहयोग ना दिया जा सका। ना ही प्रशासन और ना ही न्यायिक व्यवस्था की जवाबदेही तय की जा सकी। जमानत पर छूटे आरोपी खुलेआम घूम रहे थे फिर भी पीड़िता को सुरक्षा मुहैया नहीं कराई जा सकी। अब फिर किसी को ज़िंदा जलाया गया है । तो एक काम करो एक और एनकाउंटर कर दो। फिर से देश वाहवाही देगा, फिर देश जश्न मनाएगा, फिर पीड़िता को न्याय मिल जाएगा। इसके बाद फिर अगले अवसर के लिए तैयारी शुरू भी कर देना क्योंकि सुरक्षा तो देने से रहे फिर कोई न कोई जलेगा ही, गोली रिवॉल्वर में लोड रखना हमेशा। और हाँ! एक सवाल का जवाब भी ढूंढ़ते रहना कि क्या सच मे न्याय हो गया? समझ पाओ तो समझ लेना, बात यहाँ क्राइम रोकने की है ना कि क्राइम होने के बाद न्याय की फिल्मी स्क्रिप्ट लिखने की। ना ही उस चीज़ के लिए तालियां बटोरने की जिसे होने ही नहीं देना था, ना ही तालियां बजा कर शोर मचाने की क्योंकि इस शोर की अवधि बड़ी कम होती है। प्रश्न इस समाज के हर सदस्य को अपने आप से पूछने की आवश्यकता है कि कहाँ चूक हो रही है। हालात ये हैं कि सभी ने ए...

D-16 : साउथ की परफेक्ट सस्पेंस थ्रिलर फिल्म

Dhuruvangal Pathinaaru (D-16) मैं हॉटस्टार पर ऐसे ही रोज की तरह कोई फिल्म ढूंढ़ रहा था अचानक से मेरी नज़र 'धुरुवंगल पथिनारू यानी डी-16' फिल्म पर गई। नज़र पड़ते ही मैंने देखना शुरू नहीं किया क्योंकि मैं जब भी कोई ऐसी फिल्म देखता हूँ जिसका नाम पहली बार सुना हो तो पहले उसके बारे चेक करता हूँ कि ये फिल्म देखने लायक है या नहीं। इसपर रेस्पॉन्स अच्छा दिखा तो सोचा देख लूं। पिछले दिनों मैंने बहुत सी साउथ फिल्मों के बारे में जानकारियां जुटाई, उनके बारे में पढ़ा, साउथ की फिल्म्स को लेकर थोड़ी छानबीन भी की ये इसलिए क्योंकि साउथ फिल्मों को लेकर एक मिथ है कि साऊथ में जो टीवी पर मसाला फिल्में दिखती हैं केवल उसी तरह की फिल्में बनती हैं। लेकिन अब इस धारणा से बाहर आना चाहिए। साउथ में कुछ बेहतरीन फिल्में ऐसी हैं जो हमारी पहुंच से दूर हैं क्योंकि बाजार उन्हें स्वीकार नहीं करता। हिंदी में वहीं ज्यादातर उपलब्ध हैं जो आप आये दिनों टीवी पर देखते रहते हैं। कुछ अच्छी फिल्में भी उपलब्ध हैं जो इन रेगुलर मसाला फिल्मों से अलग हैं लेकिन अधिकतर लोगों को उनके बारे में पता ही नहीं और जब पता नहीं तो देखने का रि...

मोदी जी? जवाब चाहिए

तो मोदी जी की इस तस्वीर पर ढ़ेर सारे मीम, ढ़ेर सारे भक्तिमय पोस्ट और ढ़ेर सारे उन क्रांतिकारी चिंतकों के पोस्ट जिन्हें लिखने और बोलने नहीं दिया जाता, को देखने और पढ़ने के बाद निष्कर्ष ये निकला कि मोदी जी जो चाहते थे वो हो गया.. क्या चाहते थे ये सवा सौ करोड़ जनता अपने-अपने हिसाब से तय करे, क्योंकि मोदी जी कुछ भी कहते हैं या यूं कहें बहुत कुछ कहते हैं। _____________________________ अब बाल की खाल और थोड़े सवाल- ●स्वच्छता को किसी भी तरह से प्रोमोट करना गलत या सही? ●नौटंकी तो सब कर रहे हैं बस उचित मंच के सही प्रयोग में मोदी जी माहिर हैं सही या गलत? ●मोदी जी को कैमरे से इतना प्यार है या कैमरे को मोदी जी से? ●मोदीजी की हर एक्टिविटी दिखने से दिक्कत है या उनकी हर एक्टिविटी पर चर्चा होने से? ●क्या मोदी जी के लिए कचरा फ्रेंडली माहौल बनाया गया था? ●मोदी जी प्लास्टिक का थैला घर से मंगवाया था या वहीं पाया था? ●मोदी जी प्लास्टिक वाले थैला में से कचरा फेंक कर प्लास्टिक घर ले गए या प्लास्टिक सहित पूरा कचरा कूड़ेदान में डाल दिया? ●मोदी जी के कपड़ों पर पसीना और रेत छलावा है या हकीकत? ●मोदीजी जी...

कौन सुनेगा दुःख?

क्या कोई सुनना चाहता है वृतांत दुःख का तुम्हारे दुःख का क्या कोई जानना चाहता है कारण दुःख का तुम्हारे दुःख का दुःख तुम्हारा हानिकारक है सुखी आत्माओं के लिए तुम्हारे दुःख का वृतांत उन्हें दुःखी कर देता है उन्हें उजाले से प्रेम है अंधेरा उनका शत्रु है वो अनभिज्ञ हैं इस अंधकार से वो अनभिज्ञ हैं तुम्हारे अंधकारमयी दुःख से कारण है उनके पूर्वजों द्वारा फैलाया डर हाँ! अंधकार का डर क्या अभी भी लगता है तुम्हें कोई सुनना चाहता है वृतांत दुःख का तुम्हारे दुःख का कोई जानना चाहता है कारण दुःख का तुम्हारे दुःख का।                   - दिव्यमान यती

|| फ़्रेंडमेल ||

सुनो! मेरे फ्रेंड लिस्ट की गाड़ी रुकी पड़ी है, कोई सवारी इधर न आ रही है न ही इधर से जा रही है। क्या अघोषित मंदी ने मेरी इस फ्रेंडगाड़ी को भी मंद कर दिया है? मैं इस रिक्वेस्ट-संकट से जूझ रहा हूँ। कभी-कभी महसूस करता हूँ कि जिस वक्त मैंने इसकी शुरुआत की थी तब तो इतने लंबे सफर की कल्पना नहीं कि थी तो आज क्यों मैं इस मंदी से विचलित हो रहा हूँ। लेकिन यकायक कभी किसी रोज कुछ कूल-डूड प्रजातियों की फ्रेंडगाड़ी मेरे सामने से गुजरती है जो सवारियों से खचाखच भरी पड़ी होती है, उनके गाड़ी की गुड़वत्ता दोयम दर्जे के होने के बावजूद भी। आखिर मैं इंसान ही हूँ, इसपर विचार करने से कैसे खुद को रोक लूँ। गहन विचार भी करता हूँ लेकिन किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुंच पाता। मन कहता है इस आत्ममुग्धता से बचे रहो, विवेक कहता है इस संकट को समाप्त करो। एक अंतर्द्वंद्व निरंतर प्रभावी रहता है। इस अवस्था मे मन और विवेक के बीच तालमेल बैठाना थोड़ा कठिन मालूम पड़ता है लेकिन इनदोनों के विचारों के बीच एक अपना सशक्त विचार बनाने की कोशिश में लगा रहता हूँ। खैर! गाड़ी का रुकना ये तो नहीं दर्शाता कि वो फिर से कभी चलेगी ही नहीं, उम्मीद र...

भारत को भारत रहने दो..

ये कौन-सा तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग है जो विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के जनमत को स्वीकार करने का साहस नहीं दिखा पा रहा है। आखिर किस अकड़ में,आखिर कौन-सा परम ज्ञान है जो इनको ये यकीन नहीं दिला पा रहा है कि देश की आधे से अधिक आबादी ने ये बहुमत किसी सरकार को दिया है। संविधान में विश्वास का ढ़ोंग क्यों किया जा रहा है? क्यों बार-बार अपनी राजनैतिक लाभ के लिए संवैधानिक संस्थाओं की विश्वनीयता पर ऊँगली उठाई जा रही है? केवल आरोप मात्र से आप किस बुद्धिमत्ता का परिचय दे रहें हैं? आपका संविधान में विश्वास है तो संवैधानिक तरीके से अपनी वैचारिक और राजनैतिक लड़ाई लड़िये। आलोचना और विरोध की एक लक्ष्मणरेखा तय कीजिए जिससे इस समाज और इस देश को कोई क्षति ना हो। अगर आपको लगता है केरल में बीजेपी नहीं आई तो वही एक जगह सबसे बुद्धिजीवियों का है तो ये भी जान लीजिए एक वक़्त था जब बीजेपी कहीं थी ही नहीं, शायद कुछ वर्षों बाद हो सकता है बीजेपी भी ना रहे तब भी देश और जनता वही थी और वही रहेगी। आप अपनी बुद्धिमत्ता का ढ़ोंग उन्हीं के सामने करने में सफल हो पाए जो आपके विचारों से प्रभावित हैं लेकिन देश सिर्फ विचारधाराओं से न...

।। तीन किरदार ।।

कल मैं कॉलेज से लौट रहा था, यूँ तो अक्सर मैं पैदल ही अपने रूम जाया करता था लेकिन कल एक मित्र का साथ निभाने के लिए मैंने लंबे रास्ते का चुनाव किया। मेरे मित्र को मेट्रो पकड़नी थी इसलिए हमारा साथ मेट्रो तक ही रहा और चूँकि मैं थोड़े लंबे वाले रास्ते पर था इसलिए रूम पर आने के लिए मुझे ऑटोरिक्शे का सहारा लेना पड़ा। दोस्त को टा-टा, बाय-बाय बोलने के बाद मैं ऑटोरिक्शे में बैठ गया। ऑटोरिक्शे में बैठने के कुछ देर बाद मेरी नजर सामने वाली सीट पर बैठे एक बेबी कपल पर पड़ी, बेबी कपल इसलिए बोल रहा हूँ क्योंकि उनकी उम्र तकरीबन 16 या 17 साल की ही थी। लड़की कुछ परेशान सी लग रही थी और लड़का बड़ी मासूमियत से उसकी ओर देख उसे अपनेपन का अहसास दे रहा था। लड़की बार-बार उसके कंधे पर सर रखने की कोशिश कर रही थी लेकिन विश्व के महान चालकों में से एक ऑटो वाले भैया अपनी ब्रेक मारक कला से उस लड़की के इरादे पर पानी फेरे जा  रहे थे। फिर भी लड़की थोड़ी देर के लिए ही सही अपने प्रेमी के कंधे पर सर रखने में कामयाब हो ही जाती थी। लड़की जब उस लड़के के कंधे पर सर रखती लड़का उसके सर पर हाथ फेर उसे आराम देने की कोशिश करने ल...