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संगिनी - लघुकथा

उस सर्द रात में मैं अपने गुस्से वाली गर्मी को ज्यादा देर तक बरकरार नहीं रख पाया, जितनी भी गर्मी थी मेरे दिमाग में सब इन ठिठुरन भरी सर्द हवाओं ने ठंडा कर दिया था। सोच रहा था आखिर ये गुस्सा मुझे इस वक़्त ही क्यों आया, बेबस निगाहों से मैं दरवाजे की तरफ देख रहा था और सोच रहा था, "अब वो आयेगी, अब वो आयेगी।" बहुत देर हो गयी इतने देर में तो उसका भी गुस्सा शांत हो जाना चाहिये था, लगता है ये ठंडी हवायें जिन्होंने मेरे गुस्से को ठंडा कर दिया, अंदर उसके पास तक नहीं पहुँच पा रही। "मेरा भी न अपने गुस्से पर काबू नहीं रहता,अब भुगतो! लगता है आज की रात बाहर ही बितानी पड़ेगी" मै खुद से बाते करते हुए बुदबुदा रहा था। अचानक दरवाजे के खुलने की आवाज आयी दरवाजे की तरफ देखा तो दरवाजे पर मेरी बिटिया थी, उसने मेरी खिंचाई करते हुए पूछा,"क्यों पापा मजे में हो?" मैंने बेबसी और लाचारी भरे स्वर में उससे पूछा,"अंदर का माहौल कैसा है?" "बहुत गर्मी है अंदर पापा" मेरी बेटी ने शैतानी वाले अंदाज़ में जवाब दिया, "आज रात तो यहीं काटनी पड़ेगी आपको।" मै अभी कुछ ...

फ़िल्म समीक्षा:- ओ स्त्री! तुम जितनी डरावनी हो, उतनी ही खूबसूरत भी हो..

कलाकार- राजकुमार राव, श्रद्धा कपूर, पंकज त्रिपाठी, अपारशक्ति खुराना, अभिषेक बनर्जी, विजय राज, अतुल श्रीवास्तव लेखक- राज और डीके निर्देशक- अमर कौशिक अवधि- 2 घंटा 10 मिनट रेटिंग- 4/5 जब बात आती है कि बॉलीवुड की पिछली हॉरर-कॉमेडी फ़िल्म कौन सी है तो नाम आता है गोलमाल-अगेन, लेकिन ताजा रिलीज स्त्री की तुलना गोलमाल-अगेन से करना थोड़ी बेमानी होगी क्यूंकि ये फ़िल्म एक हॉरर-कॉमेडी के साथ-साथ एक महत्वपूर्ण संदेश भी देती है। फिल्म की कहानी शुरू होती है मध्यप्रदेश के चंदेरी नामक स्थान से,जहाँ के हर घर पर लिखा होता है, "ओ स्त्री! कल आना" चूँकि उस गाँव में लोगों का कहना है कि पूजा के चार दिन के वक़्त में 'स्त्री' नामक चुड़ैल आती है और मर्दों को उठा कर ले जाती है, बस कपड़े छोड़ जाती है। उसी गाँव में एक नये ज़माने का नया दर्जी रहता है विक्की (राजकुमार राव)। उसके दो दोस्त हैं बिट्टू (अपारशक्ति खुराना) और जना (अभिषेक बनर्जी)।  विक्की की मुलाकात एक गुमनाम लड़की (श्रद्धा कपूर) से होती है जो हर साल पूजा के वक़्त ही आती है। उस लड़की से विक्की को प्यार हो जाता है लेकिन विक्की के दोस...

देश के भविष्य की धुंधली तस्वीर

हमारा देश 72वां स्वतंत्रता दिवस मनाने की तैयारी कर रहा है। जहां देश की बड़ी-छोटी सभी संस्थाओं में स्वतंत्रता की कहानियां सुनाई जायेंगी तथा स्वतंत्रता मायने समझाये जायेंगे, वहीं एक ओर आजादी के 71 वर्ष बाद मुजफ्फ रपुर -देवरिया जैसे कांड एक सभ्य देश की महानता में धब्बा लगा रहे हैं। पहले मुजफ्फरपुर और फिर देवरिया शेल्टर होम से आने खबरों ने लोगों को आश्चर्यचकित कर दिया है। जब देवरिया शेल्टर होम से एक 10 साल की लड़की भागकर थाने पहुंची और उस लड़की ने शेल्टर होम में चल रहे वेश्यावृत्ति का खुलासा किया, तब पुलिस प्रशासन ने देवरिया के उस बाल और महिला संरक्षण गृह पर छापा मार वहां मौजूद 24 लड़कियों को रिहा कराया। हालांकि उस शेल्टर होम की और 18 लड़कियां गायब थी, जिनकी तलाश अभी भी जारी है। मुजफ्फरपुर और देवरिया कांड से पूरा देश आक्रोशित है,और हो भी क्यों ना समाज कल्याण की आड़ में में समाज के कुछ ठेकेदारों द्वारा समाज को शर्मसार करने वाला कार्य किया जा रहा है। आए दिनों  देश में बाल यौन शोषण की घटनाएं सामने आ रही हैं। यह परिस्थिति बेहद ही देश के लिये चिंताजनक है। आखिर क्या वजह है जो एक सभ्य सम...

।।बंगाल से लावारिस लाश।।

नमस्कार! मै बंगाल से लावारिस लाश बोल रही हूँ.. मेरी कफ़न भी उसी रंग की है जिस रंग की यूपी, बिहार, दिल्ली,पंजाब,महाराष्ट्र इत्यादि राज्यों की लाशों की होती हैं। "जस्टिस फॉर बंगाली लाश" क्यों नहीं? मेरे लिए सच्ची छोड़ो वो झूठी राजनीतिक हमदर्दी क्यों नहीं? सुना है आप लोकतंत्र और संविधान के रक्षक हैं, क्या मेरी मौत संविधान के दायरे में नहीं आती क्या? क्या मेरी मौत संविधान ज़ायज ठहराता है? क्या मेरे घर में लगी आग की तपिश दिल्ली तक नहीं पहुँच पाती? अगर है तो मेरी चीख,मेरी तड़प क्यों नहीं सुनाई देती? क्यों मेरी मौत पर शोर नहीं होता? क्यों मेरी लटकी लाश के सच को झुठलाया जाता है? मुझे भी भीड़ ही मारती है फिर क्यों इस मौत की भर्त्सना कोई नहीं करते? क्यों फिर तुम्हे देश में असहिष्णुता नहीं दिखती? तुम मेरी क़ब्र पर अपना सुंदर आलीशान साम्राज्य स्थापित कर राजनीति-राजनीति क्यों खेलते हो? क्यों, आखिर क्यों? आपसे निवेदन है कि अगर इन सवालों का जवाब मिले तो मेरी मौत के साथ बिखर चुके मेरे परिवार को अवश्य दे देना।                         ...

बम ब्लास्ट विशेष~।। जाने कहाँ गए वो दिन।।

।। जानें कहाँ गए वो दिन।।   (बम ब्लास्ट विशेष) पहले आये दिनों नए-नए शहरों में बम ब्लास्ट हुआ करते थे, इससे नए-नए शहरों के बारे में सुनने को मिलता था, नए-नए आतंकवादियों के नाम और उनसे जुड़ी दिलचस्प कहानियां सुनने को मिलती थी, कब, कहाँ, कितने जगहों पर कौन-कौन से बम फोड़े गए और उन बम में कौन-कौन सी सामग्री उपयोग में लायी गयी उसकी जानकारियां मिलती थी। जनसंख्या में कुछ हद तक नियंत्रित भी होती थी। लोगों के घरों में रिश्तेदारों का आवागमन भी होता रहता था मातम वाले उत्सव के कारण। लोग घरों से निकलते थे तो मन रोमांचित रहता था कि कब और कहाँ बम फूटे और एक रोमांचकारी मौत आ जाये। बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन, मॉल और पार्क इत्यादि जगहों पर हाथ में बैग लिए खड़े व्यक्ति पर संदेह करते हुए खुफिया अफसर वाले एहसास आते थे। आज इन सारे रोमांच और सामान्य ज्ञान से हम वंचित हैं क्यों? क्योंकि सेना ने आतंकवादियों को सीमा पर रोक रखा है जिनकी दिलचस्प कहानियां उधर ही किसी कोने में दफ़्न हो जाती हैं, सुरक्षा एजेंसी ने सारे नेटवर्क ध्वस्त कर दिए हैं, वो बैग वाले किरदार दिखाए तो देते हैं लेकिन उनपर अब संदेह नहीं हो पात...

।। तूफ़ान भाई आये थे? ।।

।। तूफ़ान भाई आये थे? ।। पिछले दो दिनों से उमस ने जीना हराम किया हुआ था, ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो पुरे साल की गर्मी इन्हीं कुछ दिनों में ही पड़ जायेगी। खैर गर्मी और उमस से तो लड़ना-भिड़ना चलता रहा, कभी पंखे की गरम हवा से तो कभी तौलिये से लगातार निकल रहे पसीने को सुखाता रहा। इतने से भी संतुष्टि ना मिलने पर अवसर निकाल कभी चेहरे को तो कभी पुरे शरीर को पानी से भिंगाता रहा। पिछले कुछ दिनों से तूफ़ान की खबर तूफ़ान की ही भाँति सोशल मीडिया में जोर-जोर से चल रही थी, कुछ लोगों को तूफ़ान के वक़्त पर आने का इंतजार इसलिये था ताकि वो तूफ़ान का आनंद ले सके और कुछ लोगों को तूफ़ान का वक़्त से आने का सिर्फ इसलिए इंतजार था कि वो अपनी बाँस की कुछ बल्लियों (टुकड़ों) से बने अशियानें को बचाने के लिए पूरी तैयारी कर पाये क्योंकि पिछले दिनों आये तूफ़ान के प्रकोप से अभी ठीक से उबार भी नहीं पाये थे कि एक नए तूफ़ान का ख़बर उन्हें डराये हुए है। फिलहाल इंतजार तो इंतजार ही रह गया,ये लोग खुश तो हैं लेकिन आधे-अधूरे मन से क्योंकि तूफ़ान अगर बिना बताये आ गया तो फिर उन्हें सँभलने का मौका भी नहीं मिलेगा। मै कल रात आईपीएल मैच देखने के...

एडवेंचरस शौच

वो सुबह-सुबह उठकर लोटे में पानी लिए कच्ची-पक्की, मोटी-पतली पगडण्डी से होते हुए अपने परम मित्रों के साथ दूर सरेह (जहाँ दूर-दूर तक खेत हों) में एडवेंचरस शौच के लिए जाना अब इतिहास की बातें हो गयी। खुले में शौच की पुरानी दास्ताँ अपने आने वाली पीढ़ी को सुनाया जायेगा क्योंकि हमारा वो एडवेंचर इस समाज के लिए हानिकारक था। #खुले_में_शौच #स्वच्छ_गाँव #दिव्य