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Anek Movie Review : जरूरी फिल्म का गैरजरूरी ट्रीटमेंट

Anek Movie Review


Anek Movie Review : आयुष्मान खुराना (Ayushmann Khurrana) की फिल्म 'अनेक' (Anek) सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है. इस फिल्म का ट्रेलर जब रिलीज हुआ था तब अधिकतर दर्शक इसे लेकर उत्साहित थे. इसकी कुछ वजहें थीं, एक तो आयुष्मान खुराना का लुक और दूसरा अनुभव सिन्हा के द्वारा चुना गया नया विषय. इस बार अनुभव सिन्हा (Anubhav Sinha) ने नॉर्थ ईस्ट की समस्याओं और वहां के लोगों के साथ होने वाले भेदभाव पर फिल्म बनाई. जब ट्रेलर (Anek Movie Trailer) रिलीज हुआ था तब मैंने इसे एक ज़रूरी फिल्म बताया था क्योंकि विषय ऐसा था जिसे मुख्यधारा में लाया जाना चाहिए था. फिल्म देखने के बाद एहसास हुआ कि एक जरूरी फिल्म में गैरजरूरी ट्रीटमेंट ने सब कबाड़ा कर दिया गया. फिल्म जो भी, जितना भी कहना चाहती थी, उसने कहने की भरसक कोशिश की है लेकिन उसकी कोशिश कामयाब नहीं होती. 'अनेक' अपनी अधूरी बातों से फैसला सुनाने की नाकाम कोशिश करती है.

सरकार और बागियों के बीच के जंग की कहानी

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आइए पहले कहानी की बात करते हैं फिल्म में आयुष्मान खुराना एक स्पेशल एजेंट बने हैं, जिसका नाम अमन है. वो सरकार की नॉर्थ ईस्ट में शांति स्थापित करने वाली टीम का एक अहम हिस्सा हैं. वहीं एक लड़की आडो जिसका किरदार निभा रही हैं नागालैंड की मॉडल एंड्रिया केविचुसा. वो बॉक्सर हैं और इंडिया के लिए मेडल जीतना चाहती हैं. लेकिन आयुष्मान उसे प्यार में फंसा कर बागियों तक पहुंचने का जरिया बनना चाहते हैं. दूसरी तरफ सरकार और नॉर्थ ईस्ट के सबसे बड़े बागी ग्रुप के हेड टाइगर सांगा में शांति समझौते की बातचीत शुरू होने लगती है. इस बातचीत को लीड कर रहे हैं आयुष्मान के सीनियर अबरार खान (मनोज पाहवा). इस बातचीत में खलल पैदा करता है एक और छोटा ग्रुप जिसके हेड का नाम होता है जॉनसन. जॉनसन को वहां के लोकल लोगों की आवाज के रूप में प्रस्तुत किया जाता है. आयुष्मान क्या जॉनसन से निपटने में कामयाब होते हैं, क्या सरकार और टाइगर सांगा में शांति समझौता हो पाता है? आपको इस सवाल के जवाब को जानने की उत्सुकता है तो फिल्म देखने जाना पड़ेगा.

कहानी से फील पूरी तरह गायब नजर आया

कहानी में स्कोप बहुत था. किसी भी पॉलिटिकल ड्रामा में उग्रवाद एंगल मिल जाए. उग्रवादियों और सरकार के बीच पिसती जनता का दर्द भी मिल जाए तो भला एक फिल्म स्क्रिप्ट के लिए इससे बेहतर क्या ही होगा? ये सब कुछ इस फिल्म में है लेकिन सतही तरीके से. आप भले ही ये दावा करते रहें कि हमने सच को आवाज दी है, लोगों के दर्द को दिखाया है, ग्राउंड ज़ीरो पर जाकर रिसर्च किया है लेकिन एक दर्शक को देखकर ऐसा महसूस हो कि ये सब तो पहले भी देख चुके हैं, लग रहा है जैसे किरदार और लोकेशन को बस बदल दिया गया. कहानी से फील गायब नजर आया. नार्थ ईस्ट के लोगों का दर्द दिखता तो है लेकिन दिल में उतर नहीं पाता. इसकी सबसे बड़ी समस्या है कि इसके हर किरदार द्वारा एक ही बात को घुमा फिरा कर कई बार कहने की कोशिश की जाती है. अनुभव सिन्हा हर 20 मिनट में दर्शकों का रिवीजन कराते रहते हैं. फिल्म अपनी बात कहने के बजाय समझाने पर ज्यादा जोर देती है. यहीं पर ये फिल्म नाकाम नजर आती है. बातचीत बहुत ज्यादा है जिससे दर्शक उकताने लगते हैं.


एक्टिंग दुरुस्त लेकिन डायरेक्शन कमजोर

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अनुभव सिन्हा ने पिछली दो फिल्मों 'आर्टिकल 15' और 'मुल्क' में जो मुद्दे उठाए थे वो भी जरूरी थे और उन मुद्दों पर एक अच्छी और स्पष्ट स्क्रिप्ट गढ़ी गई थी, पर यहां जैसे लगा अनुभव किसी बात का गुस्सा इस फिल्म के माध्यम से निकाल रहे हैं. डायलॉग के माध्यम से सरकार पर, सिस्टम पर और लोगों की रेसिस्ट सोच पर तंज कसने की कोशिश की है. कभी तो ये सब बहुत प्रभावी लगता है और कभी बहुत हल्का. सर्जिकल स्ट्राइक हो या इसपे बनी फिल्में, लोगों का रंग रूप के नाम पर मजाक उड़ाना हो या शांति के नाम पर चलने वाली डर्टी पॉलिटिक्स हो. इनसब को एक ही चश्मे से दिखाने की कोशिश हुई है. आयुष्मान खुराना लुक तो बढ़िया है पर वो फुल फॉर्म में नजर नहीं आए हैं. उनकी एक्टिंग तो अच्छी है पर उनका किरदार बहका-बहका सा नजर आया है. एंड्रिया बेहद खूबसूरत लगी हैं लेकिन एक्टिंग के मामले में थोड़ी कमजोर साबित हुई हैं, खासकर बॉक्सिंग वाले पार्ट में. मनोज पाहवा ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया है. उनका किरदार भी असरदार था और उनकी एक्टिंग भी. बाकियों में सिर्फ टाइगर सांगा का किरदार निभाने वाले लोइतोंगबम डोरेन्द्र सिंह याद रहते हैं. सिनेमेटोग्राफी अच्छी है. खासकर चेज सीक्वेंसेज में कैमरा वर्क कमाल का है.


कुछ सीन और डायलॉग असरदार लगे हैं, लेकिन कुछ ही

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ऐसा नहीं कि ये फिल्म बिल्कुल ही फेल हो गई कुछ सीन और डायलॉग वाकई काम करते हैं. एक सीन है जहां एक प्रेग्नेंट औरत के पति को लोकल पुलिस उठा कर ले जाती है. वो औरत अपने पति को छुड़ाने के लिए गाड़ी के सामने खड़ी हो जाती है. उस गाड़ी का ड्राइवर बार-बार गाड़ी आगे पीछे करता है उसे रास्ते से हटाने के लिए. वहां एक तनाव महसूस होता है. एक और सीन है जिसमें एक औरत अपने नाबालिग बेटे की मौत पर आयुष्मान खुराना को कोसते हुए रोती है. उस औरत की परफॉर्मेंस देख कर आप इमोशनल हो सकते हैं. कुछ डायलॉग्स भी अच्छे है एक तो इंडियन वाला है जिसे आपने ट्रेलर में देख ही लिया था. एक जगह वन विभाग में काम करने वाला अधिकारी वहां के लोकल पुलिस कॉन्स्टेबल से कहता है कि एक की शांति दूसरे के लिए अशांति हो सकती है. ऐसे कुछ और भी डायलॉग्स हैं जो प्रभावित करते हैं लेकिन वो कुछ ही हैं. एक रैप सांग है जिससे मैं बिल्कुल जुड़ नहीं पाया. जबकि इसमें इस्तेमाल किए गए लोकगीत सुनने में ज्यादा अच्छे लगते हैं.


मैंने सिर्फ फिल्म दिखाई गई कहानी के बारे में ही जिक्र किया है. बाकी आप फिल्म देखकर वहां के इतिहास भूगोल को कितना समझ पाते हैं ये आप पर है. सारी मुख्य बातें रिव्यू में बता चुका हूं. फिल्म को अपना समय और पैसा देना ना देना आपका अपना फैसला है. 


अगर आपको फिल्म रिव्यू पसंद आए तो उसे अपने दोस्त-मित्र और संबंधियों से जरूर शेयर करें क्योंकि आपका छोटी सा कोशिश किसी के समय और पैसे को बचा सकती है और सही जगह लगवा भी सकती हैं. 

जय हिंद

अनेक मूवी का रिव्यू वीडियो यहां देखें




Comments

  1. शानदार रिव्यू 👌👌 इसके बाद फिल्म देखने सिनेमा में तो नहीं ही जाएंगे, घर पर भले ही देख लें😁

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